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Vande Matram | वंदे मातरम 150 | चर्चा में क्यों है? विस्तार से समझें सभी दृष्टिकोण

आज (11 दिसंबर 2025) संसद के शीतकालीन सत्र में “वंदे मातरम” एक प्रमुख मुद्दा बन गया है। यह राष्ट्रगान (राष्ट्रीय गीत) की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शुरू हुई चर्चा का हिस्सा है, जो अब राजनीतिक विवाद में बदल चुकी है। मैं इसे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्तमान संदर्भ, सभी पक्षों के दृष्टिकोण और सामाजिक प्रभाव के साथ विस्तार से समझाता हूं। जानकारी प्रमुख समाचार स्रोतों (जैसे अमर उजाला, न्यूज18, एनडीटीवी, इंडिया डेली) और सोशल मीडिया (X पर हालिया पोस्ट्स) से ली गई है

1. वर्तमान संदर्भ: क्यों है चर्चा में?

  • 150 वर्ष पूरे होने का अवसर: “वंदे मातरम” की रचना 1882 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी (उपन्यास ‘आनंदमठ’ में)। 2025 में इसके 150 वर्ष पूरे होने पर संसद में विशेष चर्चा आयोजित की गई। लोकसभा में 8 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत की, जबकि राज्यसभा में 9-10 दिसंबर को गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हिस्सा लिया। आज (11 दिसंबर) राज्यसभा में चर्चा जारी है, जहां भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी और उज्ज्वल निकम बोलेंगे।
  • राजनीतिक तल्खी: चर्चा शांतिपूर्ण रहने के बजाय हंगामे में बदल गई। विपक्ष (कांग्रेस, TMC आदि) ने इसे “इतिहास तोड़-मरोड़ने” का आरोप लगाया, जबकि सत्ताधारी दल (भाजपा) ने इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया। X (पूर्व ट्विटर) पर #VandeMataram150 ट्रेंड कर रहा है, जहां हजारों पोस्ट्स में राष्ट्रवाद, नेहरू-गांधी परिवार पर हमले और समर्थन देखने को मिल रहे हैं।
  • हालिया ट्रिगर: मध्य प्रदेश में कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद का बयान (“मैं वंदे मातरम नहीं गाऊंगा”) ने विवाद को हवा दी। उन्होंने सफाई दी कि गीत का विरोध नहीं, लेकिन धार्मिक भावनाओं का सम्मान जरूरी है। इससे भाजपा ने कांग्रेस पर “देशभक्ति पर सवाल” उठाए।

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: एक नजर

  • उत्पत्ति और महत्व: 1882 में बंकिम चंद्र ने इसे लिखा, जो स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र बना। 1905 के बंगाल विभाजन के खिलाफ आंदोलन में इसका जाप हुआ। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, लाला लाजपत राय जैसे नेताओं ने इसे अपनाया। 1937 में कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय गीत घोषित किया, लेकिन 1950 में संविधान सभा ने केवल पहले दो पद स्वीकार किए (कुल 7 पद हैं)।
  • विवाद की जड़: 1930-40 के दशक में मुस्लिम लीग (मोहम्मद अली जिन्ना) ने इसे “मूर्तिपूजा” का प्रतीक बताकर विरोध किया, क्योंकि गीत में भारत को “मां” के रूप में देवी-स्वरूप (दुर्गा जैसी) दिखाया गया है। नेहरू ने 1938 में एक पत्र में जिन्ना की चिंताओं का जिक्र किया, जिसे भाजपा “तुष्टिकरण” कहती है। रवींद्रनाथ टैगोर ने भी पहले दो पदों को ही राष्ट्रगान के योग्य बताया था।
  • स्वतंत्र भारत में: 1973 में रवींद्र संगीत सम्मेलन में पूर्ण गीत की मांग हुई, लेकिन आपातकाल (1975) में दब गई। आजादी के बाद इसे राष्ट्रगान (जय हिंद) से कमतर रखा गया।

3. सभी दृष्टिकोण: संतुलित विश्लेषण

चर्चा के चार मुख्य पक्ष हैं। मैं इन्हें तथ्यों के साथ प्रस्तुत कर रहा हूं:

दृष्टिकोण मुख्य तर्क प्रमुख आवाजें उदाहरण/संदर्भ
राष्ट्रवादी/हिंदुत्व (भाजपा, RSS समर्थक) वंदे मातरम स्वतंत्रता का प्रतीक है, इसे “खंडित” (केवल दो पद) करके कांग्रेस ने तुष्टिकरण किया, जो देश विभाजन का कारण बना। गांधी जी इसे राष्ट्रगान बनाना चाहते थे। स्कूलों-मदरसों में अनिवार्य गान की मांग। पीएम मोदी: “विश्वासघात हुआ, नई पीढ़ी को बताना होगा।” अमित शाह: “चर्चा अनंत काल तक चलेगी, बंगाल चुनाव से जोड़ना गलत।” राजनाथ सिंह: “कांग्रेस ने विभाजनकारी शक्तियों के आगे झुक गए।” X पर #VandeMataram150 में समर्थन पोस्ट्स, जैसे रामभाई मोकारीया की अपील।
विपक्षी/कांग्रेस का पक्ष भाजपा इतिहास तोड़-मरोड़ रही, नेहरू-गांधी को बदनाम कर रही। संविधान सभा (आंबेडकर, मुखर्जी सहित) ने ही दो पद स्वीकार किए। यह असल मुद्दों (महंगाई, बेरोजगारी) से ध्यान भटकाने का हथकंडा। मल्लिकार्जुन खड़गे: “हम हमेशा गाते रहे, सरकार समस्याओं से भटका रही।” जयराम रमेश: “नेहरू को बदनाम करने का मकसद।” प्रियंका गांधी: “पीएम का दावा गलत, संविधान सभा में कोई आपत्ति न हुई।” X पर कांग्रेस समर्थक पोस्ट्स, जैसे स्वराज का: “कांग्रेस ने ही दर्जा दिया, आज नरेटिव हार रही।”
मुस्लिम/समावेशी दृष्टिकोण गीत की कुछ पंक्तियां (देवी-पूजा) धार्मिक रूप से अस्वीकार्य, लेकिन पहले दो पद राष्ट्रवादी हैं। अनिवार्यता से धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन। आरिफ मसूद: “गीत का विरोध नहीं, लेकिन मजबूरी नहीं।” ऐतिहासिक: जिन्ना का विरोध “काफिरों का गीत” कहकर। X पर बहस, जैसे रवीश कुमार का: “स्कूल में इतिहास पढ़ाओ, तमाशा मत बनाओ।”
सामाजिक/तटस्थ यह सांस्कृतिक विरासत है, लेकिन राजनीति में इस्तेमाल से विभाजन बढ़ता है। युवाओं में देशभक्ति जगाने के लिए उपयोगी, लेकिन जबरदस्ती न हो। रवींद्रनाथ टैगोर: “केवल दो पद स्वीकार्य।” X यूजर्स: सावरकर स्टेच्यू उद्घाटन से जोड़कर राष्ट्रवाद की सराहना। X पर पोस्ट्स, जैसे आचार्य धीरज: “जय श्री राम, वंदे मातरम।”

4. प्रभाव और आगे क्या?

  • सकारात्मक: चर्चा ने युवाओं में इतिहास रुचि जगाई। X पर लाखों व्यूज, स्कूलों में गान की अपील।
  • नकारात्मक: हंगामा से संसद कार्य रुक रहा (चुनाव सुधार चर्चा प्रभावित)। धार्मिक तनाव बढ़ सकता है, खासकर बंगाल/केरल जैसे राज्यों में।
  • आगे: आज राज्यसभा में जेपी नड्डा जवाब देंगे। भाजपा पूर्ण गीत को बढ़ावा देगी, जबकि विपक्ष संविधान का हवाला देगा।

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