बायोग्राफी

Biography of bankimchand chatarji | वंदे मातरम के रचयिता: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय – एक क्रांतिकारी साहित्यकार की कहानी

आज जब संसद में “वंदे मातरम” की 150वीं वर्षगांठ पर हंगामा मचा हुआ है, तो चलिए बात करते हैं उस महान शख्सियत की, जिन्होंने ये अमर गीत लिखा – बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय। वे न सिर्फ बंगाली साहित्य के पितामह थे, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की नींव रखने वाले योद्धा भी। आइए, उनकी जिंदगी को करीब से जानते हैं – सरल, मजेदार और प्रेरणादायक अंदाज में

शुरुआती जीवन: एक ब्राह्मण परिवार का होनहार बेटा

  • जन्म: 26 या 27 जून 1838, कांठलपाड़ा गांव, नैहाटी (पश्चिम बंगाल) में। एक orthodox ब्राह्मण परिवार में।
  • परिवार: पिता यादव चंद्र चट्टोपाध्याय (सरकारी अधिकारी, बाद में डिप्टी कलेक्टर बने), मां दुर्गादेवी। तीन भाइयों में सबसे छोटे। बड़ा भाई संजीब चंद्र भी उपन्यासकार थे।
  • बचपन: हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता से पढ़ाई। कलकत्ता यूनिवर्सिटी के पहले ग्रेजुएट्स में से एक (1858-59)।
  • मजेदार फैक्ट: सिर्फ 11 साल की उम्र में शादी हो गई थी! पहली पत्नी के देहांत के बाद दोबारा शादी की।

करियर: नौकरी और साहित्य का दोहरा जीवन

  • 1858 में ब्रिटिश सरकार में डिप्टी मजिस्ट्रेट और डिप्टी कलेक्टर बने। 1891 तक सेवा की, 1894 में CIE सम्मान मिला।
  • अंग्रेजों से कई बार टकराव हुए, लेकिन वे प्रो-ब्रिटिश थे और अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक।
  • 1872 में मासिक पत्रिका बंगदर्शन शुरू की – यहीं से बंगाली राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिला।

साहित्यिक सफर: बंगला उपन्यास के जनक

बंकिम बाबू को “साहित्य सम्राट” कहा जाता है। उन्होंने बंगला में आधुनिक उपन्यास की नींव रखी।

  • पहला उपन्यास: दुर्गेश्नंदिनी (1865) – बंगला का पहला बड़ा रोमांटिक उपन्यास।
  • अन्य हिट्स: कपालकुंडला (1866), मृणालिनी (1869), विषवृक्ष (1873), चंद्रशेखर (1877), देवी चौधरानी (1884)।
  • मास्टरपीस: आनंदमठ (1882) – इसमें शामिल “वंदे मातरम” ने स्वतंत्रता संग्राम को आग लगा दी!

वंदे मातरम: वो गीत जो इतिहास बदल गया

  • 1870 के दशक में लिखा, आनंदमठ में शामिल।
  • भारत माता को देवी के रूप में चित्रित – स्वतंत्रता सेनानियों का मंत्र बना।
  • 1905 के बंग-भंग आंदोलन में गूंजा, नेताजी की आजाद हिंद फौज का सलामी गीत।
  • आज भारत का राष्ट्रीय गीत!

विरासत: आज भी जिंदा है उनकी आवाज

  • बंगाल रेनेसांस के प्रमुख चेहरा।
  • रवींद्रनाथ टैगोर, श्री अरविंद जैसे दिग्गजों को प्रेरित किया।
  • उनकी रचनाएं सभी भारतीय भाषाओं में अनुवादित – हिंदी में भी बेहद लोकप्रिय।
  • निधन: 8 अप्रैल 1894, कलकत्ता (उम्र 55)।
  • बंकिम चंद्र ने दिखाया कि कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर हो सकती है। आज जब “वंदे मातरम” पर बहस चल रही है, तो याद रखिए – ये सिर्फ गीत नहीं, एक क्रांति की शुरुआत थी!

    आपको उनकी कौन सी किताब सबसे पसंद है? कमेंट में बताएं। वंदे मातरम!

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